stem cell therapy
stem cell therapy

Stem Cell Therapy

This page is to describe ‘Stem Cell Therapy’. हर व्यक्ति को यह जानना होगा कि शरीर में हमेशा किसी न किसी अंग या प्रक्रिया में डिफेक्ट आता रहता है. और शरीर उसको मरम्मत करता रहता है. जैसे- जब किसी व्यक्ति की हड्डी टूट जाती है तो वो हड्डी टूटने के बाद खुद ही जुड़ जाती है. उसका सिर्फ एलाइनमेंट ही डॉक्टर करते हैं. एलाइनमेंट करने के बाद टूटी हुई हड्डियां अपनेआप ही जुड़ जाती है. इसी तरह जब कभी किसी के शरीर में कोई घाव होता है या किसी चीज़ से शरीर का कोई अंग कट जाता है तो शरीर स्वयं उसे ठीक कर लेता है. ऐसा नहीं है कि किसी बाहरी सामान के प्रयोग से शरीर ठीक होता है. शरीर अपना मरम्मत खुद करती है. ये सभी दिखने वाली चीज़ें हैं.

Stem Cell replaces dead cells

शरीर के अन्दर किडनी, लीवर, आँख, रेटिना, मसल्स हैं. इन सभी की कोशिकाओं का रिप्लेसमेंट होता रहता है. ऐसा नहीं है कि आज जो किडनी बन गया उसकी कोशिकाएं हमेशा वैसी ही रहेगी. कोशिकाएं रिप्लेस होती रहती है. एक सेल टूटता है तो दूसरा नया सेल उसकी जगह ले लेता है. यह प्रक्रिया चलती रहती है. यह प्रक्रिया कैसे चलती है?

What does Stem Cell do?

शरीर के अन्दर Stem cell बनता रहता है. और Stem cell (स्टेम सेल) की एक खासियत होती है, कि वह शरीर के अन्दर जिस माहौल में रहता है उसी तरह के सेल में बदल जाता है. शरीर में जितने भी तरह की कोशिकाएं हैं, उन सभी में एक ही तरह का nucleus होता है. अर्थात सभी का DNA एक जैसा होता है. और ये कोशिकाएं जहाँ भी जाती है, उसी तरह के माहौल में ढल जाती है. एक ही कोशिका से पूरे शरीर का निर्माण हुआ है. एक ही कोशिका से ब्रेन, वेसल्स, आर्टरी, पित्ताशय की थैली, इत्यादि बनी है. हर कोशिका की यह विशेषता होती है कि वह दुसरे तरह के कोशिका का रूप धारण कर लेती है. शरीर में Stem cell (स्टेम सेल) का निर्माण लगातार होती रहती है. वास्तव में टेस्ट ट्यूब बेबी की प्रक्रिया में जो Zygote और Embryo बनता है, उसी से फिर पूरे मानव शरीर का निर्माण होता है. So Embryo is the most important Stem Cell. Embryo एक स्टेम सेल है. क्योंकि इसी से फिर पूरे मानव शरीर का निर्माण होता है. तो आखिर कैसे माहौल में स्टेम सेल काम करता है?

किस तरह के वातावरण में Stem Cell का सबसे अच्छा विकास होगा?

इस चीज़ का हमलोग पिछले तीन साल से अध्ययन कर रहे थे. और दुनिया में कई अन्य जगहों पर भी स्टेम सेल पर काम हो रहा है. लेकिन हर जगह Stem Cell (स्टेम सेल) का अध्ययन फेलियर साबित हुआ है. फेलियर होने का एकमात्र कारण है कि स्टेम सेल बनाने के बाद जब उसे शरीर में दिया जाता है तो स्टेम सेल की मौत हो जाती है. इसका मतलब है कि शरीर में उस स्टेम सेल को ऐसा वातावरण नहीं मिल पाता है जिसमे वो जिन्दा रह सके. यदि शरीर के अन्दर वैसा वातारण बना दिया जाय तो लेबोरेटरी में Stem cell (स्टेम सेल) को बनाकर उसे शरीर में डालने की कोई जरुरत नहीं होगी. क्योंकि स्टेम सेल बनने की प्रक्रिया एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो हर इन्सान के शरीर में चल रही है. बहुत सारी बीमारियाँ है जिसमे लोग बोने मेरो, किडनी, Stem cell (स्टेम सेल), हार्ट, लीवर इत्यादि ट्रांसप्लांट करते हैं. अगर हर अंग की मरम्मत प्रत्यक्ष रूप से स्टेम सेल के द्वारा हो जाय तो इन्हें ट्रांसप्लांट करने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी. आज के ज़माने में ट्रांसप्लांट की कोई जरुरत नहीं है. अगर किसी को किडनी चाहिए तो फिर दुसरे व्यक्ति का पेट फाड़ना पड़ता है. किसी को हार्ट ट्रांसप्लांट की जरुरत हो तो दुसरे व्यक्ति को मरना पड़ता है. ट्रांसप्लांट की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि ठीक होने की प्रक्रिया हर व्यक्ति के शरीर में चलती रहती है. और ऐसा स्टेम सेल के माध्यम से होता है. हमने लेबोरेटरी में स्टेम सेल को अलग-अलग वातावरण और अलग-अलग कल्चर मीडिया से गुजारा. हमने एक प्रोटोकॉल तैयार किया कि आखिर किस तरह के फिजियोलॉजी में Stem cell (स्टेम सेल) काम करता है. इसके बाद हमने इंसान के खून में अलग-अलग तरह का कॉम्पोनेन्ट देकर बदलाव लाया. वास्तव में जैसा दिखता है वैसा है नहीं. अगर आप दस लोगों का ब्लड का स्टडी करेंगे तो पायेंगे कि हर आदमी का खून दुसरे आदमी के खून से काफी अलग रहता है. देखने में एक ही जैसा लगता है लेकिन ब्लड कम्पोजीशन में, ब्लड के pH में, ब्लड का RBC और WBC में बहुत अंतर रहता है. इसके अलावा वेस्ट प्रोडक्ट भी ब्लड में बहुत तरह का होता है. इन चीजों के अध्ययन से आपको पता चलता है कि हर आदमी का ब्लड अलग-अलग तरह का होता है. हम जो खाते हैं. हम जिस माहौल में रहते हैं. वही हमारे ब्लड से रिफ्लेक्ट होता है.

हमने इस चीज़ को अलग-अलग लोगों पर एक्सपेरिमेंट करके देखा. कि किस तरह के माहौल में उसका स्टेम सेल अपनेआप बनता रहता है. और हमने जब उस प्रक्रिया को लोगों पर लागू किया, तो नतीजे संतोषजनक साबित हुए. अर्थात इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका कौन सा ऑर्गन ख़राब है. कोई भी ऑर्गन ख़राब हो तो वह Stem cell (स्टेम सेल) के द्वारा रिपेयर हो सकता है. किडनी फेलियर में स्टेम सेल की प्रक्रिया के द्वारा किडनी अपनेआप रिपेयर होता है. पैंक्रियास ख़राब है तो पैंक्रियास का रिपेयर अपनेआप होता है. लीवर का रिपेयर होता है. हर ऑर्गन का रिपेयर अपनेआप होता है.

इसलिए वैज्ञानिकों तथा अन्य लोगों को सिर्फ इतना समझना है कि आदमी के शरीर में मिनरल्स, विटामिन्स और वातावरण की डेफिशियेंसी की वजह से लोगों का ऑर्गन फेल हो रहा है. किसी अन्य कारण से ऐसा नहीं होता है. बैक्टीरिया या वायरस के इन्फेक्शन के बाद लोग एंटीबायोटिक का प्रयोग खूब करने लगे हैं. कोई भी बात होती है, एंटीबायोटिक भोंकना शुरू कर देते हैं. शुरू से ही इंजेक्शन भोंकना शुरू कर देते हैं. लेकिन बच्चा बीमार क्यों पड़ता है? आखिर उसको इन्फेक्शन क्यों हो रहा है? इसपर कोई रिसर्च ही नहीं कर रहा. पूरा एलोपैथिक विज्ञान ही फार्मा इंडस्ट्री से भ्रमित है. चिकित्सा के क्षेत्र में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे डॉक्टर्स होते हैं. अनुसन्धान करना डॉक्टर्स का काम होना चाहिए. लेकिन डॉक्टर्स क्या कर रहे हैं? उनको कोई बता देता है कि इस दवा से ये होता है, वो होता है. यह दवा दीजिये, ठीक होगा. लेकिन किसी की बीमारी ठीक होती नहीं है. और ज्यादातर बीमारी लाइलाज है. लोग ग़लतफ़हमी में जान गँवा रहे हैं. मुझे लगता है कि Stem Cell Therapy को अपनाकर धीरे-धीरे दुनिया भर में लोगों को खतरनाक ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया और कैंसर से बचाया जा सकता है. आपको क्या लगता है?

Leave a Reply